बनमनखी(पूर्णियाँ ) – गोरेलाल मेहता महाविद्यालय, बनमनखी के दर्शनशास्त्र विभाग द्वारा कोविड 19 में शिक्षा के स्वरूप : एक दार्शनिक विमर्श विषय पर एकदिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का सफल आयोजन हुआ जिसमें देश के बारह राज्यों से पाँच सौ से अधिक प्रतिभागियों ने अपने को पंजीकृत कराया। कार्यक्रम का प्रसारण गुगल मीट पर किया गया। वेबिनार के मुख्य संरक्षक पूर्णिया विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. राजेश सिंह ने अपने उदबोधन में कोविड 19 महामारी का सूक्ष्मतापूर्वक विश्लेषण कर इसके प्रभाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वित्त ओर शिक्षा व्यवस्था सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं तथा हमें इन परिस्थितियों के अनुरूप अपनी शिक्षा व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने की आवश्यकता है। विशिष्ट अतिथियों का स्वागत करते हुए महाविद्यालय के प्रधानाचार्य प्रो. (डॉ.) अनंत प्रसाद गुप्ता ने कहा कि भारतीय संस्कृति में शिक्षा का सर्वोत्कृष्ट स्वरूप गुरुकुल की संकल्पना है। उन्होंने वैदिक काल एवं महाभारत काल को विशेष रूप से उदधृत किया। आज कोविड 19 से शिक्षण संस्थान बन्द से हो गए है अतः वैकल्पिक शैक्षणिक अधिगम यथा – ई लर्निंग, वेब बेस्ड लर्निंग, वर्चुअल स्पेस लर्निंग, रिमोट लर्निंग, दूरस्थ गृह शिक्षा द्वारा शैक्षणिक गतिविधियों को जीवन्त करने का प्रयास उचित होगा। आमंत्रित विशिष्ट अतिथियों में प्रो. डी बी चौबे बनारस हिन्दु युनिवर्सिटी ने मदन मोहन मालवीय द्वारा दिये गए स्वदेशी शिक्षा के प्रारूप और टेक्नोलाजी की आवश्यकता को समग्र शैक्षणिक विकास के लिए आवश्यक माना परंतु भौतिक विकास के साथ-साथ नैतिक विकास होना चाहिए, आध्यात्मिक विकास होना चाहिए। पटना विवि के प्रो. एन पी तिवारी ने कहा कि सच्ची विद्या अज्ञान से मुक्त करती है। प्राचीन परंपरा में शिक्षा की श्रवण पद्धति एक महान परंपरा थी। आज टेक्नालाजी द्वारा शिक्षा के स्वरूप मे परिवर्तन समय की मांग है, किन्तु यह परंपरागत पद्धति का विकल्प नही हो सकता। टी एम बी यू भागलपुर के प्रो. डाँ नागेन्द्र तिवारी ने विषम परिस्थितियो मे छात्रों की पढ़ाई बाधित न हो इसके लिए ऑनलाइन क्लास के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर विचार प्रकट करते हुए काण्ट के बुद्धिवाद और अनुभववाद के समन्वय की तरह प्राचीन और आधुनिक शिक्षा का समन्वय आवश्यक माना। दिल्ली विवि की प्रो रीतू जयसवाल अपना विचार प्रकट की कि शिक्षा का स्वरूप सूचनाओ का संकलन नही अपितु समाज मे रह रहे लोगो की परिस्थिति और चुनौतियों को जानकर उनसे संघर्ष और उनका समाधान भी है। पूर्णियाँ विवि के श्री डुमरेंद्र राजन ने कहा कि शिक्षा शाश्वत सत्य की खोज करता है और सर्वांगीण विकास के लिए आज भी अरविंद घोष, टैगोर, महात्मा गांधी, बुद्ध के शाश्वत चिंतनों को टेक्नालाँजी युक्त शिक्षा के साथ अपनाने की जरूरत हैं। कार्यक्रम का संचालन प्रोग्राम कोओर्डिनेटर और कन्वेनर क्रमश: डॉ विकास कुमार सहा. प्राध्यापक दर्शनशास्त्र और डॉ नूतन कुमारी सहा. प्राध्यापिका इतिहास ने संयुक्त रूप से किया, जबकि धन्यवाद ग्यापन डॉ सोमेश गुंजन सहा. प्राध्यापक द्वारा किया गया। updated by gaurav gupta 

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